राधा कृष्ण संवाद

Pic :- Google

कान्हा-
कैसा जादू चलाया तुमनें किस युक्ति से काम लिया!
जो जग को मुक्ति देता है उसको केशों में बांध लिया!!

राधा-
कान्हा यूँ न परिहास करो, यूँ हृदय पे न आघात करो!
जो बांध सकती तुझको मैं क्यों दूर तुम्हें जाने देती!!
क्यों विरह अग्नि में जलती मैं क्यों जीवन भर आँसू पीती!!

कान्हा-
इस पीड़ा का है भान मुझे इस हाल से मैं अंजान नही!
ये सच है कि राधा के बिन श्याम की भी पहचान नही!!
मेरी मुरली की तानों ने बस तुझको ही साधा है!
सुन राधे तेरे बिना ये श्याम भी आधा- आधा है!!

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(12/08/2020)

ब्रह्मांड

Pic:- Gelugram

एक ब्रह्मांड बसा है भीतर जिसमें
हरपल अनगिनत हलचल…
एक अंनत आकाश सा मन जिसमें
तारों की भांति बिखरे हैं अनेकों
अनुत्तरित प्रश्न…
एक टकराव सा है भावनाओं में हर क्षण
आकाश सी ऊँची आकांक्षाएं हृदय
के इर्दगिर्द सतत करती घूर्णन
कभी गहराती तो कभी धूमिल
होती संवेदनायें.. !!
मुझे तोड़ती, कचोटती, कभी बह
जाती अकेलेपन में
अश्रु बन..!!
और ये विडंबना
इस हलचल, इस टकराव, इन संवेदनाओं
की तीव्रता हमेशा पराजित होती है
बाह्य मुखमंडल पर सज़्ज़ झूठी 
मुस्कान से….!

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(10/08/2020)

प्रश्नचिन्ह

Pic :- Google

पुनर्विचार किया जाना चाहिए
तुम्हारी सर्वव्यापकता के
सिद्धांत पर…!
विवेचना की जानी चाहिए
तुम्हारे सर्वशक्तिमान होने की
धारणा की…!
गर उपस्थित हो सर्वत्र तो क्यों
मूंद लेते हो अपनी आँखें जब
देखते हो किसी मासूम की अस्मत
लुटते हुए…!
गर सर्वशक्तिमान हो तो क्यों तुम्हारा
सामर्थ्य हार जाता है चंद दरिंदो की
हैवानियत के आगे..!
वो चींखें, वो ज़ख्म, वो वीभत्सता
और वो हैवानियत भी, प्रश्नचिन्ह हैं
तुम्हारे अस्तित्व पर…!
अवश्य ही पुनर्विचार किया
जाना चाहिए तुम्हारे ईश्वर
होने पर…!!!

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(07/08/2020)

दोस्ती

Pic :- Gelugram

बचपन में टिफ़िन से लेकर
जवानी के सपनों तक की
साझेदारी…
छोटी-छोटी खुशियां पर दावेदारी
और गहरे दुःखों में हिस्सेदारी
दोस्ती
सिर्फ़ और सिर्फ़
निभाना
है!

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(02/08/2020)

स्लो एंड स्टेडी स्टिल विंस द रेस

Pic :- Gelugram

बचपन में हम सब ने कछुए और खरगोश के बीच दौड़ की एक कहानी सुनी थी। उस कहानी में एक पंच लाइन थी ‘स्लो एंड स्टेडी विंस द रेस’। ये लाइन हम सबने सुनी है और इसके मर्म से हम सब भलीभाँति परिचित हैं। लेकिन हममें से कितने लोग हैं जिन्होंने इस लाइन को अपने जीवन में उतारने की कोशिश की है। शायद किसी ने नही…
          आज की वास्तविकता यही है कि हम सब ने अपनी जिंदगी को एक दौड़ बना दिया है। सब अंधी दौड़ में दौड़ रहे है, सबकों आगे जाना है दूसरों को पीछे छोड़ते हुए। पर लक्ष्य क्या है किसी को नही पता या यूं कहें कि जानने की कोशिश ही नही करनी। यहाँ तक कि हम अपनी अगली पीढ़ी को भी यही सिखाते हैं तुम्हें तेज़ होना है और सबसे आगे होना है वरना तुम किसी काम के नही। आज सब को खरगोश बनना है कछुआ नही। इसी ज़िद के चलते हम उनपर बेवजह का दबाव डालते रहते हैं। उन्हें पनपने का, ख़ुद को समझने का और उनके भीतर की नई संभावनाओं को खोजने का मौका ही नही देते।
          हर किसी को आगे होना है। मंजिल पर पहुंचना हैं। परन्तु बेहतर होने के बारे में कोई बात नही करता। मेरा मानना है कि सिर्फ़ अपने लक्ष्य को हासिल करना ही महत्वपूर्ण नही है बल्कि उस लक्ष्य को हासिल करने की हमारी सोच, हमारी तकनीक और हमारी जीवटता ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि मंजिल तक का हमारा जो सफर होता है वो ही हमें मजबूत इंसान बनाता है। ये ही वो अनुभव होता है जो आगे आने वाले संघर्षों और नए लक्ष्यों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
        ज़िंदगी का वास्तविक लक्ष्य बेहतर बनना होना चाहिए न कि किसी अंतहीन दौड़ का हिस्सा बनना। दूसरों द्वारा स्थापित प्रतिमानों के परे अपनी नई लीक रचना, नए फलसफे गढना दुनिया को नए तर्क देना ही हमारा मकसद होना चाहिए। इसके लिए हमारे भीतर ठहराव होना जरूरी है। धीमा होने का अर्थ ये नही कि हम कमजोर हैं। महत्वपूर्ण ये है कि लक्ष्य तक पहुँचने की हमारी कोशिश सधी हुई हो और हम पूरी तरह समर्पित हो। याद रखों वक़्त कोई भी हो, परखी गयी बातें, उक्तियाँ ज़िंदगी में सदा ही प्रासंगिक हैं।

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(30/07/2020)

शिव

Pic :- Google

सुनो!
सृष्टि के लिए जैसे है ‘शिव’
आरम्भ भी और अंत भी,
प्रारब्ध भी और प्रमाण भी
कण-कण में बसा फिर भी,
हैं व्याख्या से परे..!!

वैसे ही मेरे लिये हो ‘तुम’
साँसों के उतार चढ़ाव में,
विचारों के अंनत बहाव में,
अदृश्य लेकिन हर क्षण मुझ में
ही कहीं स्तिथ…!!

मेरा जनम भी तुम्हारे लिए
और मैं विलीन भी तुम में ही,
जिसे मैं परिभाषित न कर सकी
मेरा एक मात्र सत्य, तुम मेरे लिए
वही ‘शिव’ हो….

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(27/07/2020)

मौसम

Pic :- Gelugram

हाँ तुम मौसम ही तो हो
वो जो घिर के बरसती है और मेरे दिल
के धरातल को भीगा जाती है..!!
बारिश की वो फुहार तुम ही तो हो
हाँ तुम मौसम ही तो हो..!!

गुलाबी सर्दियों की ठिठुरन में, बदन में
उठती सिहरन में..!!
मेरे मन के अम्बर पर छाये घने कोहरे से
खिलती नर्म धूप की गर्माहट के एहसास में
तुम ही तो हो..
हाँ तुम मौसम ही तो हो..!!

झुलसाती गर्मियों की दहक में, नीरस सी
गुजरती रात में…!!
उजाड़ से ठहरे हुए  उदास दिन में
कभी न बुझने वाली प्यास में तुम ही तो हो
हाँ तुम मौसम ही तो हो..!!

तुम्हारी उदासी पतझड़ जैसी
तुम्हारी मुस्कान बसंत की बहार
शज़र से बिछड़े पत्तों में तुम
महकती बासंती बयार में तुम ही तो हो
हाँ तुम मौसम ही तो हो..!!

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(26/07/2020)

बंदिशें

Pic :- Gelugram

‘बंदिशें जरूरी हैं’
संतुलन के लिए चाहे हो प्रकृति
या मानव…!!
जब जब नियमों को तोड़ा गया हुआ
विनाश का ताण्डव…!!
नदियों जब भी लाँघी हैं सीमाएं
किनारों की
तब तब हुई हैं बेहिसाब तबाही…!!
सृष्टि ने कई बार ताक़ीद की मानव को,
किये अनगिनत इशारे…!!
और मानव अपनी ज़िद में तोड़ता रहा
सारे क़ायदे…!!
आखिर प्रकृति को सीमाओं से परे
जाना पड़ा..
मानव को उसका कद दिखलाना पड़ा!!
स्वघोषित ईश्वर दंभी मानव आज खड़ा है
शवों के ढेर में…
जो कभी थमा नही वो है आज परिंदों की
तरह कैद में..!!
अब जो खाई है ठोकर तो मानव ये तथ्य
समझ पाया है..
जीवन का सुगम संचालन बंदिशों से
ही हो पाया है…!!

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(24/07/2020)

रंग

Pic :- Gelugram

किसने किया ये भेद
उदासी को रंग दिया काला
और आशा को सफ़ेद…!!
प्रेम का प्रतीक ग़ुलाबी और पीला
ध्योतक ज्ञान का…!!
नीला रंग अध्यात्म का और केसरिया
उन्माद का…!!
इतने से भी जब संतोष न पाया
धर्म को भी रंगो में डुबाया..
भगवा हुआ हिंदुत्व और हरे को
मुसलमाँ बनाया..!!
इंद्रधनुष सात रंगों के मेल से निखरता है
रंगों के संयोजन से ही सूर्य चमकता है..!!
ईश्वर ने तो रचे सभी रंग समान भाव से
मानव पार न पा सका अपने स्वभाव से..!!
उसने सदा किया खिलवाड़ प्रकृति की
नैसर्गिकता के साथ…
स्वार्थ के चलते सदा किया मौलिकता
पर आघात..!!
संभव है, रंग जो जीवंत करते मन की
चेतनता को
एक दिन चैतन्य हो प्रश्न करें मानव के
इस अन्याय पर…!!

©अनु उर्मिल’अनुवाद’

(23/07/2020)

बरसात

अक्सर जब रातों में घनघोर
बादल बरसते हैं…
बरबस ही ये ख्याल मेरे जेहन में
आ मचलते हैं…!!
क्या सबकों ही ये बरसात इतनी
सुहाती है…
मेरे पास घर है, छत है, चाय की
गर्म चुश्कियाँ है…!!
पर उनका क्या…
जिनके पास न घर है, न छत है,
न बरसाती है…!!
जिनकी ज़िंदगी रोटी की तलाश में
सड़कों पर गुज़र जाती है…!!
क्या उनको भी बारिश इतनी ही भाती हैं..
बारिश केवल रुमानियत नही कुछ लोगो
के लिए दर्द भी है…
‘बारिश’ की रुमानियत पर लिखी गयी हैं
कई कविताएं…!!
पर जरूरी है लिखा जाए ढहती दीवारों
के बारे में…
टपकती छप्परों के बारे में…
बेघरों की ठिठुरन के बारे में…!!

Pic :- Google.com

© अनु उर्मिल’अनुवाद’

Create your website at WordPress.com
Get started